परिवार में, समाज में महिलाओं का स्थान, बालक बालिकाओं के बीच भेद- महिलाओं की तरफ देखने का दृष्टिकोण- समझदारी कैसे उत्पन्न करें|
घर में बालक बालिकाओं के भेद के बारे में सोचा जाये तो ये हम सभी जानते हैं कि अधिकतर ग्रामीण क्षेत्रों में और कुछ शहरी परिवारों में बालिकाओं को आज किस हद तक भेदभाव का सामना करना पड़ता है | भेदभाव बेटी के जन्म के पहले से शुरू होता है जब माँ-बाप को गैर कानूनी भ्रूण लिंग जांच में पता चलता है कि अगली होने वाली संतान लड़की है और वो उसका गला कोख में ही घोट देते हैं | इसके गंभीर परिणाम हमें हाल ही हुई जनगणना में पता चल ही गए हैं | भारत के लिंगानुपात को अगर देखा जाये तो २०११ में ये 940/1000 था | एक अन्य शोध के मुताबिक भारत और चीन में २०५० में कुल-मिलकर ६ करोड़ पुरुषों को स्त्री की कमी के कारण अविवाहित रहना पड़ेगा |[1] जो बच्ची इस संसार में आ भी जाती है उसको खाने पीने और पढाई से लेकर माँ-बाप के प्यार और समझ तक सभी में कम भाग मिलता है | इसके ऊपर बाल विवाह , कम उम्र में संतानोत्पत्ति और गैर-अनुभवी धाइयों की देखरेख में प्रसव, घरेलु हिंसा, स्त्रियों से अत्यधिक अपेक्षा, बहुपत्नी प्रथा, मानव खरीदफरोख्त, वेश्यावृत्ति, छेड़छाड़ जैसी बातों ने स्त्री के जीवन को और भी बदतर बना दिया है | श्री राम के देश में ऐसे अभिशाप विद्यमान होना इस बात का पर्याप्त सबूत है कि हमारी आस्था ईश्वर के आदर्शो पर चलने में कम और उसे पूजा-घर में बिठा कर अपने स्वार्थों को साधने की ज्यादा हो गयी है | एक नारी अपने, अपने परिवार और अपने समाज के लिए बड़ा योगदान कर सकती है मगर उसके लिए उसका शिक्षित और संस्कारित होना आवश्यक है | संयुक्त राष्ट्र के हिसाब से एक पढ़ी लिखी स्त्री बच्चो की संख्या नियंत्रित रखती है, पहला बच्चा देर से करती है और बच्चो में अंतर रखती है | इसके फलस्वरूप पढ़ी लिखी स्त्रियों के बच्चे स्वस्थ्य पाए गए हैं और साथ ही उनके बच्चो की शिक्षा का स्तर भी अधिक पाया गया |[2] ऐसे में हमारा ये कर्त्तव्य बनता है कि अपने घर की सभी संतानों को हम अच्छी शिक्षा दे और विशेषकर लड़की को, क्योंकि लड़की की शिक्षा और संस्कार न सिर्फ उसको बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी प्रभावित करेंगे | बस ध्यान इस बात का रखना है कि आज की संस्कार विहीन शिक्षा के साथ बच्चियों को संस्कार भी देना जरुरी है क्योंकि वो किताबी ज्ञान से ज्यादा जरुरी हैं | और वैसे भी विशुद्ध कैरियरिस्ट संतान तो चाहे लड़का हो या लड़की, वो बहुत ही निम्न कोटि का सामाजिक घटक बनती है |
स्वामी विवेकानंद के अनुसार – भारत की स्त्री का रक्षण और उत्थान शिक्षा के द्वारा ही संभव है | मगर कैसी शिक्षा? स्त्रियों की शिक्षा कैसी हो? पश्चिम की स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता और क्रियाशीलता की बातों के साथ भारतीय स्त्री की शुचिता, पवित्रता और संयम का संगम |
|| बाहर से दे थाप, एक का भीतर संबल काज | गिरहस्थी के चाक पर नर-नारी गढ़ें समाज ||
(एक कुम्हार जब चक पर घड़ा बनाता है तो उसका एक हाथ बाहर से घड़े को आकार देने के लिए कठोरता से थाप मारता है और दूसरा हाथ अन्दर कोमलता से सहारा देता है, तब जा के एक अच्छा घड़ा बनता है उसी प्रकार परिवार में पुरुष का कठोर अनुशासन और नारी का कोमल संबल स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए जरुरी है) |
हमारे यहाँ व्यक्ति की जगह परिवार को समाज की सबसे छोटी इकाई के रूप में माना गया है | व्यक्ति की पहली पाठशाला परिवार होता है | परिवार में व्यक्ति संस्कार लेता है | परिवार व्यक्ति की देखभाल करता है, बचपन और बुढ़ापे में | परिवार में व्यक्ति प्रेम करना सीखता है | परिवार से व्यक्ति रिश्ते बनाना और निभाना सीखता है | परिवार व्यक्ति को स्वयं से ऊपर सोचना सिखाता है | परिवार में व्यक्ति त्याग सीखता है | वो सीखता है कि कैसे समझौता किया जाता है | वो देखता है कि कैसे उसके माँ बाप खुद से पहले घर के अन्य सदस्यों की सोचते हैं | कैसे सीमित संसाधनों में माँ घर चलाती है, कैसे पिताजी दिन भर ईमानदारी से मेहनत करके कमा के लाते हैं | वो बेहतर भविष्य के लिए आज बचाना सीखता है | वो संतुष्ट रहना सीखता है | अपने भाई बहनों के साथ बांटना सीखता है | वो सीखता है कि क्यों माँ अपने से पहले बाकी सबका ख़याल रखती है | वो देखता है कि पिताजी माँ की कितनी चिंता करते हैं | परिवार का व्यक्ति के निर्माण में बड़ा योगदान होता है |
किसी भी परिवार में स्त्री और पुरुष की बराबर की जिम्मेदारी होती है | मगर कार्य का बंटवारा गृहस्थी चलाने के लिए सुलभ रहता है | ईश्वर ने महिलाओं और पुरुषों को अलग अलग विशेषताओं से नवाज़ा है | स्त्री बारीकियां देखने में पुरुष से अधिक सक्षम है | कई बार पुरुष को कोई वस्तु नहीं मिलती मगर स्त्री उसे तुरंत ढूंढ़ के दे देती है, उसका यही कारण है | और उसकी आभास करने की क्षमता भी पुरुष से बेहतर है | इसके साथ ही स्त्री की नज़र का व्याप पुरुष से कहीं ज्यादा होता है | स्त्री का मस्तिष्क एक साथ कई कार्य करने में सक्षम होता है |[3] जैसे कि वो फ़ोन पर बात करते करते खाना भी बना लेती है, शिशु की देखभाल भी कर लेती है और खुद की दवाइयों को भी ले लेती है | शिशु का रुदन सुनकर वो जान जाती है कि उसको क्या चाहिए | विज्ञान के अनुसार माँ का स्पर्श बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बहुत लाभदायक होता है | स्त्री के लिए सम्बन्ध, परिवार, मैत्री महत्वपूर्ण होते हैं वहीँ पुरुष के लिए प्रतिष्ठा, career, position , प्रतियोगिता, सफलता महत्वपूर्ण होते हैं |[4] ऐसी विशिष्टताओं से ये स्पष्ट है कि घर के काम-काज को स्त्री निस्संदेह पुरुष से कहीं बेहतर संभाल सकती है | अब ये प्रत्येक परिवार की अपनी सोच है कि स्त्री की स्वतंत्रता और स्वाभिमान एवं अतिरिक्त अर्थ के नाम पर वो घरेलु जिम्मेदारियों का कितना बलिदान करते हैं |
भारतीय स्त्री को अपना विकास और उत्थान सीता के आदर्श पर करना होगा | यही एकमात्र रास्ता है|[5]
ये तो हुई आदर्श स्थिति या गृहणी महिला के सन्दर्भ की बात | हर जगह आर्थिक जरूरतों और स्त्री की अपनी प्राथमिकताओं के कारण ये संभव नहीं है | ऐसे में काम-काजी महिलाओं से सम्बंधित कुछ बात कर लेना भी जरुरी होगा |
Britian में 1999 के शिक्षको के निम्नलिखित वितरण पर अगर नज़र डालें तो ये साफ़ है कि कुछ विषयो में साफ़ तौर पर पुरुष और दूसरों में महिलाए लगभग बराबर या आगे हैं.[3]
| Subject | No. of Teachers | % Men | % Women |
| History | 13, 800 | 54 | 46 |
| Geography | 14, 200 | 56 | 44 |
| Social studies | 11, 000 | 52 | 48 |
| Careers education | 1, 900 | 47 | 53 |
| Personal&Social education | 74, 200 | 47 | 53 |
| General studies | 7, 900 | 53 | 47 |
| Classics | 510 | 47 | 53 |
| Physical education | 20, 100 | 58 | 42 |
| Art | 9, 400 | 44 | 56 |
| Physics | 4, 400 | 82 | 18 |
| Info Technology | 10, 700 | 69 | 31 |
| Sciences | 28, 900 | 65 | 35 |
| Chemistry | 4, 600 | 62 | 38 |
| Occupation | % Men |
| Flight engineer | 100. 0% |
| Engineer | 100. 0% |
| Racing driver | 99. 8% |
| Nuclear engineer | 98. 3% |
| Pilot | 99. 2% |
| Air traffic controller | 94. 0% |
| Dragcar/bike racer | 93. 6% |
| Architect | 91. 0% |
| Flight deck officer | 90. 5% |
| Actuary | 90. 0% |
| Billiard player | 87. 0% |
| Accountant | 83. 0% |
Gender distribution in labor force in different sectors in 2009 in United States of America*
| Industry | Workers with college education (millions) | College educated women in the workforce today (%) |
| Professional Services | 84 | 41.9 |
| Financial Services | 80 | 42.3 |
| Science & Technology | 77 | 30.4 |
| Media | 74 | 46.4 |
(*Based on 2009 civilian labor force aged 20-65 for United States. Source: BLS; McKinsey analysis)[6]
आधुनिक इतिहास में उद्योग-प्रवण देशो में जिस तरह से स्त्री-पुरुष की हर-तरह से बराबरी के बहुत प्रयास हुए हैं और किन्ही कारणों से जितने पारिवारिक सम्बन्ध बिखरे हैं और स्त्री और पुरुष को एक दूसरे को समझने में समझ की कमी आई है, उसके निराकरण के प्रयास रूप में वहाँ पर दोनों लिंगो के बीच के अंतर को जानने के कई वैज्ञानिक प्रयास हाल ही के दशक मैं हुए हैं | इस तरह के साहित्य की बिक्री की संख्या लाखो-करोडो में है जो कि इसमें लिखी अधिकतर बातो का जनता के स्वयं के अनुभवों से जुड़े होने का पर्याप्त सुबूत है | इसके अलावा इस तरह का जितना भी साहित्य अलग अलग स्वतंत्र लेखको द्वारा लिखा गया है उन सभी के द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत और निष्कर्ष एक दूसरे को संबल देते हैं | सभी लेखक निम्न सिद्धांतो पर एकमत हैं[3][4][7] :
1. पुरुष के लिए जहां प्रतिष्ठा, career, position, प्रतियोगिता, सफलता महत्वपूर्ण होती है वहीँ स्त्री के लिए
सम्बन्ध, परिवार, मैत्री महत्वपूर्ण होते हैं |
2. पुरुष को जब तनाव होता है तो वो किसी पहेली/समस्या को सुलझा कर, कुछ खेलकर, शांत रहकर तनाव कम कर लेता है (क्योंकि ऐसा करने से उसके तनाव नियंत्रक होर्मोन Testosterone का स्त्राव होता है) [8]; वहीँ जब स्त्री को तनाव होता है तो वो बातचीत कर, प्यार दुलार पुचकार पाकर, किसी को अपनी बात सुनाकर उस तनाव को नियंत्रित करती है (क्योंकि ऐसा करने से उसके तनाव नियंत्रक होर्मोन Oxytocin का स्त्राव होता है) |[8]
3. पुरुष के लिए किसी भी परेशानी, प्रश्न, समस्या या पहेली का जवाब खोजना जरुरी होता है जबकि स्त्री के लिए ऐसी बात के बारे में बात कर लेना और उसकी बात सुने जाना अधिक महत्व का होता है |
4. पुरुष का व्यवहार सामान्यतः समान रहता है या धीरे धीरे बदलता है परन्तु स्त्री के व्यवहार में उसके शारीरिक परिवर्तनों के हिसाब से बहुत जल्दी जल्दी परिवर्तन आते हैं |
5. किसी भी सम्बन्ध में स्त्री को सामने वाले से समझ, मान, समर्पण, परवाह, जैसे व्यवहार की अपेक्षा पहले रहती है जबकि पुरुष को विश्वास, प्रोत्साहन प्रशंसा और स्वीकारे जाने की अपेक्षा अधिक रहती है |
6. स्त्री का मस्तिष्क एक साथ कई क्रियाकलापों को सुलभता से अंजाम देने में सक्षम होता है जबकि पुरुष के दिमाग की संरचना एक बार में एक कार्य पर केन्द्रित होने के लिए बनी है |
7. स्त्रियों का दिमाग ऐसे कमाई के विकल्पों में बड़े होते होते कम रूचि लेने लग जाता है जिनमे सामाजिकता और मेल-जोल कम रहता है[9], वहीँ पुरुष इन्ही विकल्पों में सामान्यतः अधिक संलग्न होने लग जाते हैं |
8. महिलाए मस्तिष्क के दोनों भाग को और पुरुष दायें भाग को अधिक अच्छे से इस्तेमाल करते हैं |
इन सभी प्रतिपादनों के मद्देनज़र ये स्पष्ट है कि कुछ रोज़गार महिलाओं के लिए बेहतर होते हैं और कुछ पुरुषों के लिए | जिन रोजगारों में, स्त्री-गुण, बातचीत (जैसे कि रेडियो-TV पर बोलना, शिक्षक), सृजनात्मकता (जैसे मीडिया एवं कला), देखभाल (nursing), एक साथ कई काम करना (व्यक्तिगत सहायक) जैसी विशेषताओं की ज्यादा जरुरत होती है उनमे महिलाएं आगे होती हैं और जिनमे पुरुष-गुण, जैसे शारीरिक बल (संघर्ष के खेल), एक ही समस्या पर ध्यान लगाना (विज्ञानं एवं तकनीक)[9], किसी वस्तु या व्यक्ति की गति और स्थान का अंदाज़ा लगाना (जल-थल-वायु गमन, F1), आदि उनमे पुरुषो की बहुतायात होती है | ये स्थिति उन देशो में है जिनको नारी-अतिवादी (feminist) व्यक्ति, समूह और हमारा मीडिया नारी सशक्तिकरण का आदर्श मानता है | इससे ये प्रमाणित होता है कि हमारी सामान्य बुद्धि से जो कुछ अंतर स्त्री पुरुष में हमें नज़र आता है उसमे कुछ तो सच्चाई है | इस बात से उद्वेलित हुए बिना एक दूसरे की विशेषताओं को स्वीकार और उनका सम्मान करना चाहिए | परन्तु वहाँ की स्थिति का अवलोकन ये बता रहा है कि ये जो अंतर दिख रहे हैं इनको अस्वीकार करते हुए नारी-अतिवादी व्यक्ति और समूह इस बात पर अड़े हुए हैं कि किसी तरह इस तथा-प्रचारित भेदभाव को कम किया जाना चाहिए और ईश्वर की योजना को ताक पर रख कर निर्बुद्धि की तरह हर चीज़ को बराबर करने पर तुल जाना चाहिए | हाथ की दो उँगलियाँ तक बराबर नहीं हैं फिर भी ये लोग हर जगह पर एकदम ५०–५० विभाजन करना चाहते हैं[6] और इन देशो की भौतिक चकाचौंध से प्रेरित होने वाले तथाकथित सुधारवादी और नारी हितो के रक्षक हमारे यहाँ भी इसी प्रकार के पागलपन को लेकर नीति-निर्धारको पर दबाव बना रहे हैं | एक तरफ तो हम कहते हैं कि व्यक्ति को वही करना चाहिए जिसमे उसकी रूचि हो और परिजनों का किसी बच्चे पर दबाव डालना गलत है और दूसरी ओर हमीं आरक्षण, शिक्षा और मीडिया के द्वारा ऐसा वातावरण बना रहे हैं जिसमे लगे कि अगर किसी क्षेत्र में नारी पुरुष से पीछे रह गयी तो वो नारी की बड़ी हार हो जाएगी और ये साबित हो जाएगा की नारी में क्षमता की कमी है | 31 अक्टूबर 2011 को द टाइम्स ऑफ़ इंडिया अखबार में छपे एक सर्वेक्षण से हम जान पाएंगे कि सामाजिक वातावरण का बच्चो के दिमाग पर कितना गहरा असर पड़ता है और मीडिया द्वारा प्रक्षेपित छवि को पाने के लिए वो किस हद तक चले जाते हैं |[10] ऐसे वातावरण में हमारे देश की बहुत सी बहने अपनी रूचि और सुविधा का विचार छोड़कर सिर्फ एक ही उद्देश्य से अपना पेशा चुन रही हैं कि वो साबित करना चाहती हैं कि लड़कियां किसी भी क्षेत्र में कम नहीं हैं | इसका कुप्रभाव ये हो रहा है कि आज मानसिक अवसाद के शिकार लोगो में महिलाओं का प्रतिशत आश्चर्यजनक रूप से बढ़ रहा है (दो-तिहाई)[7] क्योंकि महिलाओं का अवसाद नियंत्रक होर्मोन (Oxytocin) जिन क्रियाकलापों से स्त्रावित होता था, पुरुषों से बराबरी की अंधी दौड़ में और जानकारी के अभाव में स्त्रियाँ उन क्रियाकलापों को पूरी तरह से नज़रंदाज़ कर रही हैं |[7][8] एक कहावत है – मूर्ख स्वयं के अनुभव से भी नहीं सीखता, सामान्य व्यक्ति खुद के अनुभव से ही सीखता है और विद्वान दूसरों के अनुभव से भी सीखता है|अन्य देशो के अनुभव को देखकर हमें आज सीख लेनी चाहिए कि 100% बराबरी की ये अंधी दौड़ हमें पराभव की ओर ही ले जायेगी | जहां तक सामाजिक वातावरण का सवाल है तो मैं समझता हूँ कि सबको बराबर अवसर देना और जो महिला अपनी रूचि से कहीं काम करना चाहती है वहाँ उसके हितो और अधिकारों की रक्षा करना एक आदर्श वातावरण के लिए पर्याप्त है |
Albert Einstein के शब्दों में “प्रत्येक व्यक्ति उत्कृष्ट है | मगर आप किसी पानी में तैरती मछली की काबिलियत अगर उसके पेड़ पर चढ़ने की क्षमता से मापेंगे तो वो सारी जिंदगी स्वयं को मूर्ख समझते हुए ही बिताएगी |”
वहीँ अगर सामान्य सोच से थोडा हटकर नारी अतिवादी विचारधारा को परखा जाये तो कुछ बातें ध्यान में आती हैं | नारी अतिवादी स्त्री पुरुष बराबरी की बात तो करते हैं मगर ये नहीं कहते कि नारी के लिए जो विशेष बातें हमारे सामाजिक व्यवहार और संविधान में निहित हैं उनसे भी भेद-भाव बढ़ता है | जैसे सरकारी बसों में “महिला सीट”, किसी भी नर संहार या आपदा में मृत या घायल बच्चो और महिलाओं की संख्या का अलग से बताया जाना, संविधान की धाराओं में “violating the dignity of a woman”, सामाजिक व्यवहार में प्रयोग होने वाला वाक्य “लड़की से बात करने की तमीज” और “अगर बस में कोई महिला खड़ी हो तो उसको सीट दे देनी चाहिए” जैसी कई बातें कैसे बराबरी की भावना को पुष्ट करती हैं | मेरा आशय यहाँ पर ये नहीं है कि ये सब गलत है बल्कि में सिर्फ इतना ध्यान दिलाना चाहता हूँ कि हमें एक दूसरे के अंतर का आदर करना चाहिए और अपनी विशेषताओं पर गर्व होना चाहिए | साथ ही हमारे यहाँ नारी अतिवादी विचार में आस्था रखने वाले बंधू भगिनियों ने एक और बात को नज़रंदाज़ किया हुआ है – कि पुरुष भी घर को चलाने के लिए कुछ योगदान और त्याग करते हैं और उन्हें भी एक भावनात्मक संबल की जरुरत होती है | वातावरण ऐसा बन गया है कि सामान्य व्यक्ति, विशेषकर समाज की बहने सोचती हैं कि पुरुषो की कोई विशेष जरूरतें नहीं होती | अगर पुरुषों से ये अपेक्षा की जाती है कि वो स्त्री की विशेष जरूरतों के प्रति संवेदनशील हो तब इस सोच को प्रोत्साहन देना कि पुरुषों की कोई विशेष जरूरतें नहीं सिर्फ ऐसे लोगों के विचारों की अपूर्णता बयान करता है | ये हमें याद रखना होगा कि अगर पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों पर अत्याचार हुआ है तो स्त्री-प्रधान समाज की बात कर के पुरुषों पर अत्याचार की नींव रखने की सोच आत्मघातक है |
यहाँ पर विचारणीय है कि नारी स्वाभिमान और स्वतंत्रता जैसी बातें हाल के कुछ वर्षो में ही ज्यादा उठने लगी हैं जबकि हमारे इतिहास में ऐसा कोई ब्यौरा नहीं मिलता | इसके क्या कारण हो सकते हैं??
2015 तक वैश्विक गरीबी को आधा करने की संयुक्त राष्ट्र की सहस्राब्दी मुहिम (United Nations Millenium campaign to halve world poverty by the year 2015) के अनुसार विश्व की कुल कर्मावधि का दो-तिहाई से अधिक भाग महिलाओं के द्वारा होता है |[2] इसमें जीवनयापन के अधिकतर कार्य जैसे कि घर का रख-रखाव, बच्चो-बूढों की देखभाल, खाने-पीने की संभाल जैसे घरेलु कार्यो की बहुतायात है | इस तथ्य से एक बात तो स्पष्ट है कि गृहणी महिलाओं का समाज में योगदान किसी भी दृष्टिकोण से कम तो नहीं होता जैसा कि मीडिया और समाज की तथाकथित विकसित और आधुनिक जनता द्वारा तर्क किया जाता है | पर समस्या शायद ये है कि इसको देश के सकल घरेलु उत्पाद जैसे मापतोलों में नहीं गिना जाता, न ही पतियों द्वारा इस बात के लिए पत्नियों को श्रेय दिया जाता है और इस योगदान का दर्जा बहुत कम है | वर्त्तमान समाज में बहुत सारी समस्याएँ शायद इसी वजह से आ रही है ki हमने कुछ कर्मो को छोटा और कुछ कर्मो को बड़ा मान लिया (जैसे जातिवाद की समस्या का एक मुख्य कारण भी यही है ki जो कार्य शुद्र करते थे वो नीच था और जो कर्म क्षत्रिय या ब्रह्मण करते थे वो उच्च | इसकी वजह से आज कोई उस नीच कम को करना नहीं चाहता और बिन योग्यता के भी सभी अब तथाकथित उच्च कर्मो को ही करना चाहते हैं)| अब सवाल उठता है कि ये समस्या आधुनिक समाज में ही क्यों आ रही है कि इस योगदान का संज्ञान न लिया जाना समाज के लोगो और स्त्रियों को इतना खटने लग गया है | इस के विश्लेषण के लिए हम अपने भूतकाल में नज़र डालते हैं |
|| यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः ||
|| नारी शक्ति का रूप होती है || हर नारी लक्ष्मी का रूप होती है ||
|| घर में बेटी का आगमन अर्थात सौभाग्य और समृद्धि का आगमन ||
|| पत्नी का भाग्य पति की सहायता करता है || हर सफल पुरुष के पीछे एक महिला का हाथ होता है ||
क्या हमको लगता है कि नारी की महत्ता के इतने सारे जुमले, वाक्य, श्लोक, कथा, कहावतें सिर्फ महिलाओं को झूठी दिलासा देने के लिए बने थे?
नारी शक्ति का रूप होती है | अगर वो चाहे तो घर को आबाद कर सकती है और इसी नारी के कारण कई लोग अपनी राह भटक जाते हैं और गर्त में गिर जाते हैं, घर बर्बाद हो जाते हैं | अगर किसी घर की नारी अपने संस्कारों पर दृढ है, उस घर का पुरुष अगर खराब भी होगा तो भी संतानों पर उसका प्रभाव नहीं पड़ेगा मगर अगर किसी घर की स्त्री नीच है तो आने वाली पीढ़ियों तक का भविष्य निश्चित अँधेरे में है| अगर किसी घर का पुरुष खराब होता है तो सिर्फ एक व्यक्ति खराब होता है पर अगर किसी घर की स्त्री खराब होती है तो पूरी की पूरी पीढियां खराब हो जाती हैं | नारी के हाथों में उतनी शक्ति है जिसकी की रंचमात्र भी पुरुष नहीं रख सकता | जब काली माँ को क्रोध आता है तो स्वयं शिव-शंकर को उनके चरणों में लेटना पड़ता है | प्रख्यात अर्थशास्त्री श्री एस. गुरुमूर्ति के अनुसार 2005-2006 में आई वैश्विक आर्थिक मंदी की मार से भारत के बच जाने के एक प्रमुख कारणों में से एक था भारतीय महिलाओं की बचत की आदत|[11]
“ये समझना बहुत कठिन है की क्यों इस देश में स्त्री और पुरुष के बीच इतना अधिक भेद-भाव किया जाता है जबकि वेदान्त प्रतिपादित करता है की सभी प्राणियों में एक ही चेतना है | तुम स्त्रियों पर दोषारोपण तो करते हो मगर उनके उत्त्थान के लिए तुमने क्या किया है??” [5]
संघर्ष और गुलामी के 1200 वर्षों ने शायद हमें अपनी संस्कृति की मूल बातों से पीछे हटा दिया और पुरुष अपने शारीरिक बल के दंभ में स्त्री को उपेक्षित और तिरस्कृत समझने लगा, और उसकी अवहेलना करता रहा | आधुनिक समाज में facebook जैसी सोशल नेट्वर्किंग साइट्स और सामान्य सामाजिक व्यवहार में भी स्त्रियों की कोमलता और संवेदनशीलता जैसी विशिष्टताओं का मज़ाक उड़ाया जाता रहा है | और धीरे-धीरे दबते-दबते वो अथाह शक्ति आज अनियंत्रित हो अपना कुप्रभाव दिखाना शुरू कर रही है | जब हमारे चारो तरफ हम बिगड़ी हुई संताने देखते हैं | जब हमारे चारो तरफ हम देखते हैं कि वो आज सारे लिहाज ख़त्म करने को उतारू है | जब हमारे आस पास बहनों को त्याग और समर्पण के कथन पसंद नहीं आते | जब आज की नारी को पाश्चात्य भौतिकता के साधन, खुलेपन और स्वतंत्रता के सामने हमारे घरेलु संस्कार और सीमाएं दम-घोंटू लगते हैं | जब “बहन” और “भैय्या” जैसे संबोधन पसंद नहीं किये जाते | जब हमारे चारो तरफ हम व्यभिचार देखते हैं | जब नागपुर की एक अदालत के परिसर में ही एक बलात्कारी को उसके द्वारा प्रताड़ित महिलाएं पीट-पीटकर मार डालती हैं |[12] जब फूलन देवी जैसे किरदार उभरते हैं | जब कई घरों में नारी अपने पति को अपने इशारों पर नचाती है और उस घर के बड़े तिरस्कृत होते हैं | तब वही अथाह अनियंत्रित शक्ति होती है | परमाणु में अथाह उर्जा होती है | उसी उर्जा को सृजनात्मकता के लिए और उसी को विध्वंस के लिए उपयोग किया जा सकता है | इसलिए ऐसी उर्जा के नियंत्रित होने में ही भलाई है |
नियंत्रण के लिए जिस तरह शिव जी काली माता के चरणों में लेटे थे उसी प्रकार शायद आज पुरुषों को अपने घर की महिलाओं के महत्व, उनके योगदान को स्वीकारना होगा, कमा के लाने के मिथ्या दंभ को छोड़ना पड़ेगा और संसाधनों पर स्त्री को बराबर हक देना पड़ेगा, महिलाओं के स्वभाव और व्यवहार को समझना पड़ेगा और उनकी जरूरतों के साथ सामंजस्य बिठाना पड़ेगा | और ऐसा एक या दो घर में होने से पार नहीं पड़ेगी | और सिर्फ घर में ही नहीं समाज में, मीडिया में गृहणी महिलाओं के योगदान की चर्चा होगी, उसके किरदार को कुछ चकाचौंध और ग्लैमर मिलेगा, तब जा के महिलाओं का रुख थोडा बदलना शुरू हो सकता है |
गांधीजी के अनुसार : “मेरे विचार से, यह स्त्री और पुरुष दोनों ही के लिए निकृष्ट है कि किसी घर की स्त्रियों को घर त्यागकर उसके रक्षण के लिए हथियार उठाने का आह्वाहन किया जाये या इसके लिए किसी भी तरह से प्रेरित किया जाये | यह बरबरता की ओर पलायन है और अंत का आगम है | पुरुष की जिम्मेदारियां उठाने में स्त्री स्वयं और पुरुष, दोनों को ही गर्त में धकेलेगी और इसका पाप पुरुष के सर होगा.... किसी गृहस्थी को बाहरी आक्रमण से बचाने में जितना साहस और शक्ति लगती है, उतनी ही साहस और शक्ति उस गृहस्थी को सँभालने और व्यवस्थित रखने में भी लगती है |”[13] गांधीजी के ये उद्गार अपने आप में बहुत कुछ कह जाते हैं |
नारी की तरफ देखने का दृष्टिकोण
आज चाहे हम गली-मोहल्ले की बात करें या किसी विश्वविद्यालय या कार्यालय की, महिलाओं को हर जगह मैली सोच से भरी नज़रों का सामना करना पड़ता है | आस-पास चाहे अनपढ़ आदमी हो या पढ़े लिखे नौकरी-पेशा पुरुष इस बात से कुछ अंतर नहीं पड़ता, उल्टा ऐसा अनुभव आता है कि पढ़े लिखो की दृष्टि अधिक नापाक होती है | इस स्थिति में व्यक्ति अपने घर की स्त्री को बाहर भेजने से पहले सौ बार सोचता है | अगर सोचा जाये कि जो लोग महिलाओं को गलत नज़र से देखते हैं क्या उनके घर पर महिलाएं नहीं होती...होती हैं...फिर भी वो दूसरे घर की महिलाओं पर नज़र डालते हैं | स्थिति तो यहाँ तक आ गयी है कि आज लड़कियां अपने रिश्तेदारों के घरों तक पर सुरक्षित नहीं हैं | जो व्यक्ति अपने घर की महिलाओं को ही नहीं छोड़ता वो दूसरे घर की महिलाओं का तो क्या लिहाज रखेगा | मगर विचारणीय ये है कि ऐसा क्यों हो रहा है?
अगर हम विचार करें कि व्यक्ति के कर्म किन बातों से प्रेरित होते हैं तो उक्त समस्या के कारणों को समझने में मदद मिल सकेगी | मनोविज्ञान में एक सिद्धांत है २ प्रकार के मन का | एक चेतन मन और दूसरा अवचेतन मन | चेतन मन वो गृहण करता है जो वो करना चाहता है और वो इस बात को निर्धारित कर सकता है कि कौन सी बात हमारे अवचेतन मन में जाये, मगर अवचेतन मन वो सब कुछ गृहण करता है जो उसे दिया जाता है, जो चेतन मन देखता -सुनता –पढता है | और निस्संदेह हमारा अवचेतन मन हमारे चेतन मन से अधिक शक्तिशाली होता है, अर्थात हमारे व्यवहार और सोच-विचार को प्रभावित करने में अवचेतन मन का कहीं अधिक योगदान होता है | किसी व्यक्ति का व्यवहार इस प्रकार उसके अवचेतन मन की खुराक पर निर्भर हो जाता है, अर्थात जो वो देखता सुनता पढता है, उसी प्रकार वो सोचता है और वही करता है | आज के परिवेश में विज्ञापनों में, चलचित्रों में, अखबारों में, मीडिया में, इन्टरनेट पर, facebook जैसी sites पर, जब हर समय किसी को एक ही विचार परोसा जाएगा कि जो मन में आये वही करना जिंदगी है और युवा लड़के के जीवन की सार्थकता सिर्फ अधिक से अधिक लड़कियों को प्रभावित करने में है तो इसमें क्या आश्चर्य है कि वो इसी उद्देश्य को लेकर अपने कर्म करेगा | अवचेतन मन की सबसे अधिक ग्राह्यता तब होती है जब हमारा चेतन मन सुप्तावस्था (trance) में होता है | ऐसी अवस्था सामान्यतः सुबह उठने के तुरंत बाद और रात को सोने के तुरंत पहले होती है, और आज इन समयों में व्यक्ति क्या करता है | वो सुबह गाने सुनते हुए उठता है, कमरे में लगी किसी तस्वीर को देखता है और वही सोचते सोचते अपना दिन शुरू करता है, सोने से पहले भी यही सब करता है | जब हम कुछ देखते देखते खो जाते हैं तब भी हमारा चेतन मन बेअसर हो जाता है और वो बात सीधे हमारे अवचेतन मन में प्रवेश कर जाती है | ऐसी कोई भी बात हमारे व्यवहार पर ज्यादा असर डालती है |[14] आजकल व्यक्ति सामान्यतः क्या देखते देखते खोता है…कोई चलचित्र, कोई धारावाहिक, आदि आदि | इसलिए इस तरह की चीज़ों का प्रभाव अधिक हो रहा है | दूसरी बात जो व्यक्ति के कर्मो को प्रभावित करती है वो है उसके आदर्श| आज के युवा के आदर्श कौन हैं…अभिनेता, cricket खिलाडी, Mark Zuckerberg (Facebook के संस्थापक) जैसे लोग | अब अगर ऐसे लोगों को आदर्श लेकर वो अपना व्यवहार कर रहे हैं तब तो गनीमत है कि हमारे युवा बहुत दायरे में हैं |
आज जिस तरह से व्यक्ति के सामने सिर्फ उसके इन्द्रिय - तुष्टिकरण को महिमामंडित करके परोसा जा रहा है, उस माहौल में किसी भी व्यक्ति के लिए ऐसी सब बातों पर से ध्यान हटाना आसान नहीं है | पर अगर हम अपनी परिवार व्यवस्था और संस्कारों की गरिमा बनाए रखें तो आज के युग में भी आदर्श खड़े किये जा सकते हैं | घरों और समाज में स्वार्थ और इन्द्रिय तृप्ति की वृत्ति को नियंत्रित करने और परमार्थ की भावना को गौरवान्वित करने की और ध्यान दिया जाये तो इस अभिशाप से हमारे समाज को बचाया जा सकता है |
यहाँ पर एक और चर्चा करने लायक तथ्य ये है कि हाल के दशक में जैसे-जैसे स्त्रियों की शिक्षा का प्रसार हुआ है और कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ी है, विशेषकर एशिया महाद्वीप में, वैसे-वैसे कार्यालय और गृहस्थी दोनों के बोझ से बचने के लिए महिलाओं में अविवाहित रहने का एक चलन चल गया है | The Economist में हाल ही प्रकाशित हुए एक शोध में निम्न तथ्य उजागर हुए हैं[1]
1. एशिया के समृद्ध भाग – जापान, ताइवान, दक्षिण कोरिया, हांगकांग – में शादी की औसत उम्र महिलाओं के लिए 29-30 और पुरुषो के लिए 31-33 हो गयी है, जो कि अमेरिका में क्रमशः २६ और २८ है |
2. इन्ही देशो में 35-39 वय में अविवाहित महिलाओं का प्रतिशत ३० वर्षो में २० अंको से भी अधिक बढ़ गया है |
3. जापान में 2010 में 30 वय की एक-तिहाई महिलायें अविवाहित थी |
4. ताइवान में 2010 में 30-34 वय की 37% और 35-39 वय की 21% महिलायें अविवाहित थी |
5. थाईलैंड में 18 वर्ष की उम्र में पढाई छोड़ने वाली महिलाओं में से 12.5% 40 की वय के बाद भी अविवाहित थी और विश्वविद्यालय शिक्षित युवतियों में ये प्रतिशत 20% था | 40 की उम्र में प्रवेश करने वाली महिलाओं में अविवाहितों का प्रतिशत 2000 में 12% हो गया जो 1980 में 7% था |
6. बैंग्कोक में 40-44 वय की 20% और हांगकांग में 30-34 वय की 27% महिलाएं अविवाहित हैं |
7. बीजिंग में २००३ में ये पाया गया कि $600-$1800 की मासिक आय वाली महिलाओं में से आधी, 50%, अविवाहित थी | उनमे से आधी महिलाओं का कहना था कि उनको विवाह करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि वो आर्थिक रूप से सक्षम हैं |
8. दक्षिण कोरिया में पुरुष कह रहे हैं कि महिलाएं “वैवाहिक हड़ताल” पर चली गयी हैं |
इन तथ्यों से ये निष्कर्ष निकालना बहुत ही आसान है कि स्त्री को पढाई मत कराओ, काम मत कराओ | मगर ऐसा कहना खुद से और आने वाली पीढ़ियों से धोखेबाजी होगी | विश्लेषण इस बात का करना चाहिए कि क्यों महिलाओं के लिए गृहस्थी इतनी नापसंद हो रही है और हम अपनी शिक्षा में ऐसा क्या दे रहे हैं जिससे विशेषकर शिक्षित महिलाएं पारंपरिक व्यवस्था से कट रही हैं | एक वैज्ञानिक शोध के मुताबिक परिवार से पुरुष सामाजिक बनता है जिससे उसके शरीर में नर होर्मोन (testosterone) नियंत्रित होता है और ये समाज में अपराध के नियंत्रण में सहायक होता है |[1] जिन देशो में परिवार व्यवस्था चरमरायी हुई है वहाँ सामाजिक ताना बना बिखरा हुआ है | इससे संस्कार और अपने स्वार्थ से ऊपर सोचने की आदत नहीं है जिसने उन देशो के आर्थिक स्वास्थ्य पर भी असर डाला है | इसका परिणाम हाल ही आये आर्थिक संकट में स्पष्ट था | वहीँ एशिया और खासकर हमारे देश और चीन के बच जाने के पीछे मुख्य कारण यहाँ की परिवार व्यवस्था को माना जा रहा है |[1][11] परिवार इस तरह व्यक्तिगत और सामाजिक दृष्टि से बहुत ही सोची समझी व्यवस्था है जो “सर्वजन हिताय” और "वसुधैव कुटुम्बकम” की भावना को पुष्ट करती है | इसके अलावा हमारी सभ्यता में परिवार व्यवस्था के निहित होने की वजह से हमारे देश में सेवानिवृत्ति योजनाओं पर अधिक ध्यान नहीं दिया गया क्योंकि वृद्धावस्था में व्यक्ति की देखभाल परिवार के जिम्मे मानी गयी | ऐसे में परिवार व्यवस्था का महत्व और भी बढ़ जाता है | ये बात सही है कि इस लहर ने अभी तक भारत और चीन के एक-दो बड़े शहरों को छोड़ कर बाकी को ज्यादा प्रभावित नहीं किया है, हालाँकि हमारे यहाँ भी असर दिखना शुरू हो गया है | हमें सोचना होगा कि कितने समय तक हम अपने समाज को इस लहर से बचा पायेंगे | और कैसे??
स्वामी विवेकानंद ने पाया कि पश्चिम की महिलाओं का आदर्श पत्नी है, जबकि “हिन्दू स्त्री की विशिष्टता जिसका उन्होंने विकास किया है और जो उनका आदर्श है वो है मातृत्व…” [5]
जिस तरह से मध्यकालीन सभ्यता और कुरीतियों की बेड़ियों में बंधे रहना समाज के स्वस्थ्य के लिए ठीक नहीं है उसी प्रकार स्वतंत्रता और अत्याधुनिकता के नाम पर पश्चिमी आदर्शों को आँख मूँद के आत्मसात करना भी समाज के लिए उतना ही हानिकारक है | रास्ता तो बीच का ही निकालना पड़ेगा | इसके लिए गांधीजी की ग्राम स्वराज की परिकल्पना को आधार मानकर चलना होगा | पहले तो हमें ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां आज भी अधिकतर महिलाएं अँधेरे में हैं, वहाँ पर शिक्षा और रोज़गार की रौशनी पहुंचानी पड़ेगी | लिज्जत पापड़ और अमूल जैसे सहकारी संस्थानों के पदचिन्हों पर चलकर वहाँ की आर्थिक हालत को सुदृढ़ करना पड़ेगा | इसके साथ ही सुशिक्षा का प्रसार करना पड़ेगा | इससे शहरों की ओर बेतहाशा पलायन रुकेगा, ग्रामीणों की सोच का विकास होगा, बालक बालिकाओं के बीच भेदभाव मिटेगा और स्त्रियों की स्थिति में सुधार होगा | एक ग्रामीण व्यक्ति जब अपनी शिक्षा या रोज़गार के लिए शहर की ओर पलायन करता है तो एक तरफ तो वो अपने घर के संस्कारों से दूर होता है और दूसरी तरफ पश्चिम के अन्धानुकरण के केंद्र शहरों में उसके मस्तिष्क पर लगातार वहाँ के सिद्धांत और आदर्शों का प्रहार होता है | ऐसे में व्यक्ति का अपनी परम्पराओं से लगाव ख़त्म हो जाता है और शहर की चकाचौंध और खुलेपन से होने वाला इन्द्रिय तुष्टिकरण उसे मंत्रमुग्ध कर उसकी सोच पर हावी हो जाता है | इसको रोकने से अन्य बातों के साथ लड़कियों की तरफ देखने के दृष्टिकोण में भी निश्चित ही बदलाव आएगा | इस सब के साथ ही शहरों में भी स्त्रियों की स्थिति को सुधारने के लिए उचित प्रयास जरुरी हैं | जहाँ पर स्वतंत्रता और उच्छ्रिन्खलता में फर्क नहीं किया जाता, जहां पश्चिम के भोगवाद के प्रभाव में स्त्री को एक सजावटी सामान के रूप में परोसा जाता है, जहां पर हर दूसरा विज्ञापन स्त्री और पुरुष के परस्पर आकर्षण को भुनाकर अपना उल्लू सीधा करने पर उतारू है, जहां स्त्री नौकरी करना जरुरी समझती है क्योंकि इससे उसके ससुराल वाले उसे दबा नहीं पाएंगे, जहां स्त्रियों में शारीरिक और मानसिक बीमारियों का ग्राफ तेजी से चढ़ रहा है; वहाँ भी नहीं कहा जा सकता कि स्त्री अपने उत्थान की ओर बढ़ रही है | उसके लिए इस बात का ध्यान रखना जरुरी है कि जहां भी हो, स्त्रियों के विकास का आदर्श स्वामी विवेकानंद के कहेनुसार देवी सीता का, मातृत्व का होना चाहिए | और ऐसा होने के लिए आज की पीढ़ी के पुरुषों और महिलाओं में राम और सीता के प्रति श्रद्धा और स्वयं पर उस देवत्व को पाने की आकांक्षा और विश्वास होना पहली जरुरत है | राम और सीता के किरदारों को भी पूजा घर से उठा कर सामाजिक परिवेश में पेश करने की जरुरत है | पति-पत्नी के रिश्ते को सकारात्मकता मिलने की जरुरत है | समाज में जहां जहां स्त्री को ईंट-भट्टे जैसे खतरनाक और अत्यधिक शारीरिक श्रम जैसे कार्यों में लगना पड़ता है उसके कारण गरीबी को दूर करना पड़ेगा | और जहां व्यक्ति अपनी मूलभूत आवश्यकताओं से ऊपर सोच सकता है, वहाँ स्त्री और पुरुष के परस्पर भेदों और विशिष्टताओं का दोनों को आदर करना एवं स्त्रियों या किसी भी समाज के उत्कर्ष के मापदंडों को बदलना और उन्हें उस जाती की खूबियों के अनुसार तय करना आवश्यक होगा | अंत में, हम सभी को ये स्मरण रखना होगा कि विविधता संसार में रस और रूचि का सृजन करती है | और ईश्वर की प्रत्येक कृति की अपनी विशेषता है | किसी एक कृति की विशेषताओं के बल पर दूसरे को नीचा दिखाकर (अपने शारीरिक बल के दंभ में डूबे पुरुष) या दूसरी कृति के लायक कर्मों को ऊँचा दिखाकर (स्त्री उत्थान के ठेकेदार नारी-अतिवादी), अगर महिलाओं पर पुरुष बनने का दबाव डाला गया तो ऐसा नहीं है कि ये संभव न हो, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति अर्द्धनारीश्वर का रूप है, पर अगर ऐसा हुआ, तो इसके मानव सभ्यता को गंभीर परिणाम भोगने पड़ सकते हैं |
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